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Saturday, December 10, 2022

मिस्वाक की फ़ज़ीलत और उसके फ़ायदें | ह़दीसे पाक

 मिस्वाक की फ़ज़ीलत और उसके फ़ायदें 

ह़दीस न. 1  :- तबरानी बइसनादे ह़सन हज़रते अली रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हु से रावी हुज़ूर सल्लल्लाहु तआ़ला अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर यह बात न होती कि मेरी उम्मत पर शाक़ (भारी) होगा तो मैं उनको वुज़ू के साथ मिस्वाक करने का हुक्म फरमा देता (यानी फर्ज़ कर देता और कुछ रिवायतों में फ़र्ज़ का लफ्ज़ भी आया है)

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ह़दीस न. 2 :- इसी तबरानी की एक रिवायत में है कि सय्यदे आ़लम सल्लल्लाहु तआ़ला अ़लैहि वसल्लम उस वक़्त तक किसी नमाज़ के लिये तशरीफ़ न ले जाते जब तक कि मिस्वाक न कर लेते। 
हदीस न. 3 :- सही मुस्लिम शरीफ़ में हज़रते आइशा सिद्दीक़ा रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हा से रिवायत है कि हुज़ूर बाहर से जब घर में तशरीफ़ लाते तो सबसे पहला काम मिस्वाक करना होता ।
हदीस न. 4 :- इमाम अह़मद हज़रते इब्ने उ़मर रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हुमा से रिवायत करते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआ़ला अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मिस्वाक का इन्तिज़ाम रखो कि वह सबब है मुँह की सफ़ाई और रब तबारक व तआ़ला की रज़ा का। 

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हदीस न. 5 :- अबू नई़म हज़रते जाबिर रद़ियल्लाहु तआ़ला अ़न्हु से रावी हैं कि रसूलुल्लाह स़ल्लल्लाहु तआ़ला अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि दो रकअतें जो मिस्वाक करके पढ़ी जायें बे मिस्वाक की सत्तर 70 रकअतों से अफ़ज़ल हैं। 
हदीस न. 6 :- एक और रिवायत में है कि जो नमाज़ मिस्वाक करके पढ़ी जाये वह उस नमाज़ से सत्तर हिस्से अफ़ज़ल है जो बिना मिस्वाक के पढ़ी जाये।

मस अला :- मिस्वाक दाहिने हाथ से करना चाहिये और मिस्वाक इस तरह हाथ में ली जाये कि छंगुलिया मिस्वाक के नीचे और बीच की तीन उंगलियां ऊपर और अंगूठा सिरे पर नीचे हो और मुट्ठी न बंधे। मसअला : दौतों की चौड़ाई में मिस्वाक करे लम्बाई में नहीं चित लेट कर मिस्वाक न करें मसअला :- पहले दाहिने जानिब के ऊपर के दाँत मांझे फिर बाई जानिब के ऊपर के दांत फिर दाहिनी तरफ के नीचे के दाँत और फिर बाई तरफ के नीचे के।
मसअला :- जब मिस्वाक करना हो तो उसे धो लें और मिस्वाक करने के बाद भी उसे धो डालें, ज़मीन पर पड़ी न छोड़े बल्कि खड़ी रखे और उसे इस तरह खड़ी रखे कि उसके रेशे वाला हिस्सा ऊपर रहे। मसअला :- अगर मिस्वाक न हो तो उंगली या सख़्त कपड़े से दाँत मांझ ले यूँही अगर दाँत न हों तो उंगली या सख़्त कपड़ा मसूढ़ों पर फेर ले। मसअला :- मिस्वाक नमाज़ के लिये सुन्नत नहीं बल्कि वुज़ू के लिये है तो जो आदमी एक वुज़ू से चन्द नमाज़ें पढ़े उससे हर नमाज़ के लिये उस वक़्त तक मिस्वाक का मुतालबा नहीं जब तक मुँह की बू न बदल जाये, नहीं तो मुँह की बू दूर करने के लिये मुस्तकिल सुन्नत है अगर वुज़ू में मिस्वाक न की थी तो नमाज़ के वक़्त कर लें | 

مسواک کی فضیلت اور اس کے فاںٔدے

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